शिमला।
कभी अकेले लैपटॉप और सपनों के सहारे काम करने वाली एक युवती, आज एक सशक्त शिक्षण संस्थान की पहचान बन चुकी है। यह कहानी है इश्लीन कौर की, एक ऐसी उद्यमी की, जिन्होंने अस्थिरता से स्थायित्व और अनिश्चितता से आत्मविश्वास तक का सफर तय किया।
साल 2021 में इश्लीन कौर ने सेल्स और मार्केटिंग के क्षेत्र में फ्रीलांसर के रूप में अपना करियर शुरू किया। काम मिल रहा था, आय भी हो रही थी, लेकिन कुछ अधूरा सा था। न पहचान थी, न स्थिरता और न ही भविष्य की स्पष्ट दिशा। हर महीने नए क्लाइंट ढूंढने की दौड़ ने उन्हें यह एहसास कराया कि केवल व्यक्तिगत ‘गिग’ से आगे बढ़कर कुछ स्थायी और प्रभावशाली खड़ा करना ज़रूरी है।
यहीं से जन्म हुआ द एपेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट का। उद्देश्य स्पष्ट था, बिज़नेस ओनर्स, फाउंडर्स और प्रोफेशनल्स को बिखरे प्रयासों के बजाय सुव्यवस्थित सिस्टम के ज़रिए आगे बढ़ने में मदद करना। इश्लीन का मानना है, फ्रीलांसर से बिज़नेस ओनर बनने का सफर आसान नहीं था, लेकिन यही यात्रा आज मेरी सबसे बड़ी पहचान है।”
शुरुआती दिन आसान नहीं थे। सेल्स से लेकर ट्रेनिंग डिलीवरी तक, हर जिम्मेदारी उन्होंने खुद निभाई। लेकिन परिणाम देने की उनकी निरंतर कोशिश ने धीरे-धीरे उन्हें अनिश्चितता से ऑथोरिटी की ओर पहुंचा दिया।
आज द एपेक्स इंस्टीट्यूट छह सदस्यों की मज़बूत टीम के साथ काम कर रहा है, करीब ₹25 लाख का वार्षिक टर्नओवर हासिल कर चुका है और भारत के साथ-साथ USA, UAE और ऑस्ट्रेलिया तक अपनी पहुंच बना चुका है। इश्लीन अब IT फाउंडर्स और सर्विस बिज़नेस ओनर्स को कंसल्टिंग देकर उनके व्यवसाय को तेज़ी से आगे बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।
इश्लीन कौर की यह यात्रा केवल एक उद्यमी की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उन हज़ारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो आज अस्थिरता से जूझ रहे हैं, लेकिन भीतर कहीं एक संस्थान खड़ा करने का सपना पल रहा है। यह कहानी बताती है कि अगर इरादे स्पष्ट हों और मेहनत निरंतर, तो एक व्यक्ति भी बदलाव की पूरी संस्था बन सकता है।
घर की रसोई से राष्ट्रीय पहचान तक: निशु लता सूद की संघर्ष, स्वाद और सफलता की कहानी
शिमला।
कभी अंबोटा गांव की एक साधारण रसोई में पारंपरिक अचार और चटनियों की खुशबू से शुरू हुआ सफर, आज देशभर के बाज़ारों तक पहुंच चुका है। यह कहानी है निशु लता सूद की—जिन्होंने मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास के दम पर निशु फूड प्रोडक्ट्स को एक भरोसेमंद पहचान बना दिया।
साल 1998 में, जब संसाधन सीमित थे और बाज़ार की समझ भी शुरुआती दौर में थी, निशु लता सूद ने पारंपरिक घरेलू रेसिपीज़ के साथ अपने उद्यम की नींव रखी। अचार, चटनी, मुरब्बा और घरेलू स्नैक्स से शुरू हुआ यह छोटा सा प्रयास, उनके समर्पण और गुणवत्ता के प्रति प्रतिबद्धता के चलते धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
उन्होंने स्वाद से कभी समझौता नहीं किया। परंपरा को आधार बनाते हुए उन्होंने समय के साथ नवाचार अपनाया। खासतौर पर मिलेट आधारित उत्पादों की ओर कदम बढ़ाकर आधुनिक पोषण और बदलती उपभोक्ता पसंद को अपने ब्रांड से जोड़ा। यही वजह रही कि घर से शुरू हुआ यह काम एक मान्यता प्राप्त ब्रांड में बदल गया, जिसके उत्पाद आज रिटेल, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और अन्य ब्रांड्स तक पहुंच रहे हैं।
लेकिन निशु लता सूद की कहानी केवल व्यवसायिक सफलता तक सीमित नहीं है। वे ‘पे इट फॉरवर्ड’ की सच्ची मिसाल हैं। एक मास्टर ट्रेनर के रूप में उन्होंने हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सैकड़ों महिलाओं को फूड प्रोसेसिंग और उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने सपनों को साकार कर सकें।
मुख्यमंत्री स्टार्टअप योजना और CSIR-IHBT पालमपुर से मिले रणनीतिक सहयोग ने उनके व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यह समर्थन न केवल तकनीकी और व्यावसायिक मजबूती बना, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी नया विस्तार मिला।
निशु लता सूद खुद कहती हैं, ‘मेरी यात्रा यह दिखाती है कि जुनून, धैर्य और सही सहयोग के साथ महिलाएं अपने सपनों को हकीकत में बदल सकती हैं।’ उनकी यह यात्रा आज उन हज़ारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो घर की दहलीज़ से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाना चाहती हैं।
निशु फूड प्रोडक्ट्स की यह कहानी स्वाद की नहीं, संकल्प, संघर्ष और सशक्तिकरण की कहानी है, जो बताती है कि सही इरादों के साथ किया गया छोटा सा कदम भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता है।
जंगलों से जुड़ा सपना, महिलाओं से बनी ताक़त: ‘माउंटेन बाउंटीज़’ की प्रेरक कहानी
शिमला।
यह कहानी किसी बड़े कॉरपोरेट आइडिया की नहीं, बल्कि संवेदना, समझ और साझेदारी से जन्मे एक मिशन की है। हिमाचल की पहाड़ियों में पली-बढ़ी माउंटेन बाउंटीज़ आज एक ब्रांड है, लेकिन इसकी जड़ें जंगल बचाने और ग्रामीण महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका देने के संकल्प में हैं।
इस पहल की सूत्रधार हैं ममता चंदर। माउंटेन बाउंटीज़ की शुरुआत किसी बिज़नेस प्लान से नहीं, बल्कि एक सवाल से हुई, जंगल क्यों सिमट रहे हैं? जवाब गांवों में मिला। कुल्लू क्षेत्र में काम के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि ईंधन और रोज़गार की कमी ने महिलाओं को जंगलों पर निर्भर कर दिया है। समाधान भी वहीं से निकला, यदि महिलाओं को स्थानीय संसाधनों से वैकल्पिक, टिकाऊ रोज़गार मिले, तो जंगलों पर दबाव अपने आप कम होगा।
यहीं से जन्म हुआ जागृति नामक एनजीओ और सहकारी मॉडल का, जिसने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर स्थानीय अधिशेष उत्पादों की पहचान की। महिलाओं के सुझावों से खुबानी और आड़ू के तेल जैसे उत्पाद सामने आए, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा। आगे चलकर विशेषज्ञों की मदद से रोज़हिप, बिच्छू बूटी (नेटल) और खुबानी जैसे जंगली वनस्पतियों को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदला गया, जहां स्वाद, सेहत और प्रकृति तीनों का सम्मान हुआ।
ममता चंदर कहती हैं, टिकाऊपन किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि साझा प्रणाली का परिणाम है, जहां महिलाएं एक-दूसरे की मदद करती हैं।
आज माउंटेन बाउंटीज़ पूरी तरह गांव की महिलाओं द्वारा एकत्र किए गए कच्चे माल पर निर्भर है। 15 वर्षों से अधिक समय में यह पहल एक मज़बूत सप्लाई चेन, रिटेल बिज़नेस, एनजीओ और महिला सहकारिताओं का नेटवर्क बन चुकी है।
हिमालय की खुशबू समेटे ये उत्पाद केवल बाज़ार तक नहीं पहुंचे, बल्कि एक संदेश भी लेकर आए कि प्रकृति की रक्षा और आजीविका का विकास साथ-साथ संभव है। माउंटेन बाउंटीज़ की यह यात्रा बताती है कि जब समाधान समुदाय के साथ मिलकर गढ़े जाएं, तो वे टिकाऊ भी होते हैं और प्रेरक भी।
यह कहानी सिर्फ एक ब्रांड की नहीं, बल्कि महिलाओं की सामूहिक शक्ति, जंगलों की सुरक्षा और हिमालयी आत्मनिर्भरता की कहानी है, जहां हर उत्पाद में पहाड़ों की खुशबू और उम्मीद की चमक शामिल है।
रासायन-मुक्त खेती से स्वास्थ्य का संकल्प: ‘एग्रीवा नैचुरली’ की हरित सफलता कहानी
शिमला।
जहां ज़्यादातर किसान रसायनों पर निर्भर खेती को मजबूरी मानते हैं, वहीं हिमाचल के ऊना ज़िले के अंब क्षेत्र के छोटे से गांव बेहर-बिठाल में एक अलग सोच ने आकार लिया। यह कहानी है रीवा सूद कीजि, न्होंने यह साबित कर दिया कि प्रकृति के साथ काम करके भी न सिर्फ़ खेती की जा सकती है, बल्कि उसे एक सशक्त ब्रांड में बदला जा सकता है।
साल 2022 में शुरू हुई एग्रीवा नैचुरली की नींव एक सरल लेकिन मजबूत विश्वास पर रखी गई कि स्वस्थ जीवन की शुरुआत शुद्ध और ईमानदार खेती से होती है। इसी सोच के साथ रीवा सूद ने रसायनों से दूरी बनाते हुए पूरी तरह केमिकल-फ्री और ऑर्गेनिक फार्मिंग को अपनाया।
उनके फार्म पर आज ऐसे उच्च मूल्य वाले और पोषण से भरपूर फसलें उगाई जा रही हैं, जो हिमाचल प्रदेश में अपेक्षाकृत नई मानी जाती हैं, जैसे ड्रैगन फ्रूट, अंजीर, अश्वगंधा और स्टीविया। जैविक खाद, मौसमी चक्रों के सम्मान और मिट्टी संरक्षण पर आधारित खेती ने न केवल भूमि की सेहत बनाए रखी, बल्कि उपज को भी प्राकृतिक पोषण से भरपूर बनाया।
एग्रीवा नैचुरली की खास पहचान केवल खेती तक सीमित नहीं है। यहां वैल्यू एडिशन को भी उतनी ही अहमियत दी गई। खेत में उगे ड्रैगन फ्रूट से लेकर प्राकृतिक, ताज़ा और केमिकल-फ्री जूस तैयार करने तक पूरी गुणवत्ता श्रृंखला पर खुद ब्रांड का नियंत्रण है। यही वजह है कि एग्रीवा नैचुरली आज सिर्फ़ एक फार्म नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और वेलनेस का भरोसेमंद नाम बनता जा रहा है।
रीवा सूद कहती हैं’ हम प्रकृति के खिलाफ नहीं, उसके साथ काम करने में विश्वास रखते हैं। हमारा वादा है कि खेत से सीधे, शुद्ध और सेहतमंद उत्पाद, एक बेहतर भविष्य के लिए।’
आज एग्रीवा नैचुरली न केवल हिमाचल प्रदेश में एक्ज़ॉटिक सुपरफ्रूट्स की नई पहचान बना रहा है, बल्कि यह संदेश भी दे रहा है कि अगर सोच साफ़ हो और संकल्प मज़बूत, तो टिकाऊ खेती ही भविष्य का रास्ता है। यह कहानी सिर्फ़ खेती की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, नवाचार और आत्मनिर्भर हिमाचल की कहानी है—जहां हर फल में प्रकृति का सम्मान और किसान का स्वाभिमान झलकता है।
रसोई से रोज़गार तक: ‘उमंग’ ने 50 महिलाओं के जीवन में भरी आर्थिक आज़ादी की उमंग
शिमला।
यह कहानी केवल एक उद्यम की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, सामूहिक शक्ति और सामाजिक बदलाव की मिसाल है। हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की मेहनत और हुनर को पहचान दिलाने वाली ‘उमंग’ आज सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुकी है, जहां रसोई की दीवारों से बाहर निकलकर महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं।
इस प्रेरक पहल की अगुवाई कर रही हैं रीना चंदेल। एम.ए. और बी.एड. जैसी शैक्षणिक योग्यताओं के बावजूद रीना चंदेल ने परंपरागत नौकरी की राह छोड़कर उद्यमिता को चुना। साल 2016 में उन्होंने एक सेल्फ हेल्प ग्रुप की स्थापना की, जिसका उद्देश्य साफ़ था—घरेलू दायरे से आगे बढ़कर महिलाओं को स्थायी आजीविका से जोड़ना।
शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ घर से हुई। स्थानीय फलों को उपयोग में लाकर पपीता पेड़ा और आंवला बर्फी जैसे अनोखे उत्पाद तैयार किए गए। धीरे-धीरे यह प्रयास रंग लाने लगा और आज ‘उमंग’ के पास 10 से अधिक खाद्य उत्पादों की श्रृंखला है, जिसमें अचार, जैम और चटनियां भी शामिल हैं।
‘उमंग’ की रफ्तार को नई उड़ान मिली जब इसे मुख्यमंत्री स्टार्टअप योजना के तहत समर्थन मिला। वित्तीय सहायता के साथ-साथ पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग में मार्गदर्शन ने इस पहल को मज़बूती दी। इसका असर ज़मीन पर साफ़ दिखा. आज ‘उमंग’ से जुड़ी 50 महिलाएं हर महीने ₹8,000 से ₹10,000 की स्थिर आय अर्जित कर रही हैं और सच्चे अर्थों में आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनी हैं।
रीना चंदेल कहती हैं, ‘हमने सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं बनाया, बल्कि एक समुदाय खड़ा किया है, जहां 50 महिलाएं एक-दूसरे के साथ खड़ी हैं।आज ‘उमंग’ के उत्पाद न केवल स्थानीय बाज़ारों में, बल्कि राज्य के बाहर भी अपनी पहचान बना चुके हैं।
‘उमंग’ की यह यात्रा बताती है कि जब जुनून, सरकारी सहयोग और सामूहिक प्रयास साथ आते हैं, तो सामाजिक बदलाव संभव होता है। यह कहानी हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो अपने हुनर को पहचान दिलाकर आत्मनिर्भर बनना चाहती है, क्योंकि उमंग सिर्फ़ नाम नहीं, एक आंदोलन है।
पहाड़ों में आत्मनिर्भरता की मिसाल: ‘किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र’ से सजी संस्कृति, रोज़गार और स्वाभिमान
शिमला।
ऊँचे पहाड़, कठिन रास्ते और सीमित संसाधन, किन्नौर की यही पहचान रही है। लेकिन इन्हीं पहाड़ियों से निकली एक महिला ने यह साबित कर दिया कि अगर भरोसा अपनी जड़ों पर हो, तो भविष्य यहीं बनता है। यह कहानी है दीप माला नेगी की, जिन्होंने मुनाफ़े से पहले संस्कृति संरक्षण और स्थायी आजीविका को अपना लक्ष्य बनाया।
किन्नौर के जनजातीय अंचल से ताल्लुक रखने वाली दीप माला नेगी ने ‘किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र’ की शुरुआत बेहद सीमित साधनों के साथ की। उनका सपना सरल लेकिन दूरदर्शी था. अपने क्षेत्र की अनोखी पहचान को बचाना और उसे टिकाऊ रोज़गार से जोड़ना। उन्होंने स्थानीय किन्नौरी सामग्री की शुद्धता और गुणवत्ता पर भरोसा किया और उसी के सहारे “टेस्ट ऑफ़ किन्नौर” को दुनिया तक पहुंचाने की ठानी।
इस पहल की खासियत इसकी जड़ों से जुड़ी सोच है। पारंपरिक अचार और चटनियों से लेकर दुर्लभ प्राकृतिक तेलों और स्थानीय एथनिक परिधानों तक, किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र ने क्षेत्र की विरासत को आधुनिक बाज़ार से जोड़ा। हर उत्पाद में पहाड़ों की खुशबू, मेहनत की सच्चाई और संस्कृति का सम्मान झलकता है।
दीप माला नेगी कहती हैं, मेरी यात्रा आत्मनिर्भरता की गवाही है। अगर आप अपनी स्थानीय क्षमताओं पर विश्वास रखें, तो भविष्य यहीं, इन्हीं पहाड़ियों में बन सकता है। आज यह पहल केवल एक ब्रांड नहीं, बल्कि युवा रोज़गार और महिला उद्यमिता का मज़बूत मंच बन चुकी है, जहां नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं का मूल्य समझ आता है।
छोटी-सी शुरुआत से निकला यह प्रयास आज समुदाय आधारित रोज़गार का सशक्त उदाहरण है। किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र ने दिखा दिया है कि संस्कृति संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकते हैं, बस दिशा सही होनी चाहिए।
यह कहानी पहाड़ों की है, पर संदेश देशभर के लिए हैस्था, नीय हुनर में ही वैश्विक भविष्य छिपा है।
रसोई से रोज़गार तक: नीलम वर्मा ने ‘RS फूड प्रोडक्ट्स’ से आत्मनिर्भरता की मिसाल रची
शिमला।
कभी घर की चारदीवारी तक सीमित एक गृहिणी, आज अपने गांव की कई महिलाओं के लिए रोज़गार और आत्मविश्वास का सहारा बन चुकी हैं। यह कहानी है नीलम वर्मा की, जिन्होंने मेहनत, हुनर और सही मार्गदर्शन से RS फूड प्रोडक्ट्स को एक पहचान दिलाई। सोलन ज़िले के रहाट गांव से ताल्लुक रखने वाली नीलम वर्मा का शुरुआती जीवन सामान्य था। गृहिणी के रूप में उनका समय सिलाई-कढ़ाई और घर-गृहस्थी में बीतता था। लेकिन आर्थिक मजबूती की चाह और कुछ अलग करने की ललक उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही। साल 2015 उनके जीवन में टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब उन्होंने फूड प्रोसेसिंग से जुड़ा एक प्रशिक्षण कार्यक्रम जॉइन किया।
इस प्रशिक्षण ने उनके हुनर को दिशा दी। पति के सहयोग और अपने आत्मविश्वास के बल पर नीलम वर्मा ने RS फूड प्रोडक्ट्स की शुरुआत की। घर की रसोई में तैयार होने वाले पारंपरिक अचार, चटनियां और शरबत अब व्यवस्थित रूप से बाज़ार तक पहुंचने लगे। स्वाद, शुद्धता और परंपरा, इन तीनों को उन्होंने अपने ब्रांड की पहचान बनाया।
सरकारी योजनाओं और संस्थागत सहयोग ने उनके सपनों को और पंख दिए। जिला उद्योग केंद्र (DIC) सोलन, डेवलपमेंट ब्लॉक कंडाघाट और ऑर्गेनिक मिशन शिमला से मिले अनुदान और मार्केटिंग सहयोग ने RS फूड प्रोडक्ट्स को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई।
आज RS फूड प्रोडक्ट्स न केवल बाज़ार में एक भरोसेमंद नाम है, बल्कि गांव की ज़रूरतमंद महिलाओं के लिए रोज़गार का साधन भी बन चुका है। नीलम वर्मा उनके साथ काम करने वाली महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दे रही हैं—ठीक वैसे ही, जैसे कभी उन्होंने खुद के लिए यह राह चुनी थी।
नीलम वर्मा का संदेश साफ़ है, “मैं हर महिला से कहना चाहती हूं—खुद पर विश्वास रखें, आगे बढ़ें और अपनी अलग पहचान बनाएं।” उनकी यह यात्रा बताती है कि अगर संकल्प मज़बूत हो और हुनर पर भरोसा हो, तो रसोई से निकलकर भी एक सफल उद्यम खड़ा किया जा सकता है। RS फूड प्रोडक्ट्स की कहानी केवल एक व्यवसाय की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर महिला, स्थानीय स्वाद और ग्रामीण सशक्तिकरण की सच्ची कहानी है, जो आज कई महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है।
सुई-धागे से सपनों तक: ‘ज़रिम’ ने पहाड़ों की बुनाई को दिया राष्ट्रीय पहचान
शिमला।
औपचारिक शिक्षा न हो, संसाधन सीमित हों, फिर भी अगर संकल्प मज़बूत हो, तो कामयाबी रास्ता खुद बना लेती है। हिमाचल प्रदेश के दूरस्थ पहाड़ी गांव गोहरमा से निकली ज़रिम सेल्फ हेल्प ग्रुप की कहानी इसी विश्वास की मिसाल है। इस प्रेरक यात्रा की अगुवाई करती हैं मान दासी, जिन्होंने सुई-धागे और ऊन से आजीविका की वह बुनियाद रखी, जो आज राष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुकी है।
साल 2003–04 में, वॉटरशेड योजना के तहत मान दासी ने 10 महिलाओं के छोटे समूह के साथ पारंपरिक ऊन के मोज़े बुनने का काम शुरू किया। स्कूल न जाने के बावजूद उनकी समझ और नेतृत्व ने इस स्थानीय ज़रूरत को संरचित उद्यम में बदल दिया। स्थानीय प्रशासन के सहयोग से समूह को दिशा मिली और पहाड़ों की मेहनत बाजार तक पहुंचने लगी।
दो दशकों में ‘ज़रिम’ ने घाटी की सीमाएं तोड़ीं। दिल्ली, जयपुर, उदयपुर, शिमला और धर्मशाला जैसे शहरों की प्रदर्शनियों और मेलों में लाहौली ऊनी उत्पादों ने अपनी अलग पहचान बनाई। समय के साथ समूह ने सी-बकथॉर्न आधारित उत्पादों को भी जोड़ा स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों में मूल्यवर्धन का बेहतरीन उदाहरण। ‘ज़रिम’ की सबसे बड़ी ताक़त है पीढ़ियों का संगम। जहां बुज़ुर्ग महिलाएं आज भी पारंपरिक बुनाई से विरासत को सहेजती हैं, वहीं नई पीढ़ी मोबाइल फोन के ज़रिये ऑपरेशंस, ऑर्डर और सप्लाई संभाल रही है। परंपरा और तकनीक का यह मेल ‘ज़रिम’ को समय के साथ आगे बढ़ाता है।
मान दासी कहती हैं, हमने सुई और ऊन से शुरुआत की मान दासी कहती हैं, आज हमारी बुज़ुर्ग महिलाएं परंपराएं बुनती हैं और युवा पीढ़ी व्यवसाय संभालती है। 2003 से निरंतर संचालन, राष्ट्रीय पहुंच, और ऊनी व सी-बकथॉर्न उत्पाद—ये सब ‘ज़रिम’ की पहचान हैं।
यह कहानी केवल बुनाई की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामूहिक शक्ति और पहाड़ी स्वाभिमान की है। ‘ज़रिम’ ने दिखा दिया कि जब हाथों में हुनर और दिल में विश्वास हो, तो पहाड़ों से भी राष्ट्रीय सपने बुने जा सकते हैं।
पलायन से पहचान तक: ‘पावना हैंडलूम सेंटर’ ने बदली एक परिवार और गांव की तक़दीर
शिमला।
कभी रोज़गार की तलाश में शहरों की धूल फांकने वाली एक महिला, आज अपने गांव में रहकर सम्मानजनक आजीविका चला रही है और दूसरों के लिए भी उम्मीद बन चुकी है। यह कहानी है मंडी ज़िले के करसाला गांव की पावना कुमारी की, जिन्होंने पवना हैंडलूम सेंटर के ज़रिये आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा।
2019 से पहले पावना का जीवन आसान नहीं था। परिवार वर्षा-आधारित खेती पर निर्भर था, जो साल भर का सहारा नहीं बन पाती थी। मौसमी बेरोज़गारी के चलते पावना और उनके पति को मज़दूरी के लिए शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। सालाना आमदनी महज़ ₹50,000—और भविष्य अनिश्चित।
जनवरी 2019 में पावना ने आशा सेल्फ हेल्प ग्रुप जॉइन किया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत हैंडलूम और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण मिला। यहीं उन्हें समझ आया कि सांस्कृतिक कला को व्यवसाय में बदला जा सकता है।
पवना ने सिर्फ़ बुनना ही नहीं सीखा—उन्होंने बेचना भी सीखा। सोशल मीडिया की ताक़त पहचानी और अपने उत्पादों के लिए ‘नारी शक्ति CLF’ नाम से फेसबुक व इंस्टाग्राम पेज बनाए। नतीजा पट्टू , चप्पलें और फ़्रेम जैसे हैंडलूम उत्पादों की मांग तेज़ी से बढ़ी।
आज पवना की मासिक आय ₹4,000 से बढ़कर ₹10,000 हो चुकी है। पलायन रुक गया है। वे अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा पा रही हैं और भविष्य के लिए बचत भी। पवना अब अपने ब्लॉक में रोल मॉडल हैं, जो अन्य महिलाओं को पलायन छोड़कर स्वरोज़गार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। पवना कुमारी कहती हैं, अब काम के लिए गांव छोड़ना नहीं पड़ता। आज मैं अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा सकती हूं और भविष्य सुरक्षित कर रही हूं।
पवना हैंडलूम सेंटर की कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण, डिजिटल पहुंच और आत्मविश्वास मिल जाए, तो गांव में रहकर भी सम्मानजनक रोज़गार संभव है। यह सिर्फ़ एक उद्यम नहीं उम्मीद, स्वाभिमान और स्थिर भविष्य की कहानी है।
दुबई से दस्तकारी तक: ‘और्निका’ ने परंपरा को लक्ज़री में बदला
शिमला।
कभी एक हुक, थोड़ा-सा धागा और सृजन का आनंद, यहीं से शुरू हुई एक ऐसी यात्रा, जिसने हिमालयी हस्तकला को अंतरराष्ट्रीय फैशन मंचों तक पहुंचा दिया। यह कहानी है सेल्फ़न की, जिनकी ब्रांड और्निका आज परंपरा और आधुनिकता के खूबसूरत संगम की पहचान है।
साल 2015 में शौक़ के तौर पर शुरू हुई क्रोशिया की दुनिया जल्द ही जुनून बन गई। दुबई में एक सफल प्रोफेशनल करियर को पीछे छोड़ते हुए सेल्फ़न भारत लौटीं, एक स्पष्ट लक्ष्य के साथ: हाथ से बुनी, उच्च-स्तरीय क्रोशिया को आधुनिक डिज़ाइन भाषा में ढालकर एक लक्ज़री ब्रांड खड़ा करना।
और्निका का हर पीस परंपरा में रचा-बसा है, लेकिन उसकी प्रस्तुति आधुनिक सौंदर्यबोध से निखरी हुई। यही वजह है कि ब्रांड ने ग्रामीण कारीगरी और अंतरराष्ट्रीय फैशन के बीच की दूरी को पाट दिया। लंदन और दुबई जैसे फैशन हब्स में प्रदर्शनों और वर्कशॉप्स के ज़रिये और्निका ने वैश्विक पहचान बनाई।
कौशल और गुणवत्ता की पहचान तब और मजबूत हुई, जब वस्त्र मंत्रालय ने संस्थापक को “मास्टर क्राफ्ट्सपर्सन” के सम्मान से नवाज़ा। लेकिन और्निका की असली ताक़त इसका सामाजिक उद्देश्य है, ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें स्थायी रोज़गार देना, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
सेल्फ़न कहती हैं, ‘परंपरा में जड़ें और आधुनिक संस्कृति में उड़ान, और्निका का यही दर्शन है। आज और्निका सिर्फ़ एक फैशन ब्रांड नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण लक्ज़री का प्रतीक है, जहां हर धागा सम्मान, रोज़गार और स्वाभिमान की कहानी बुनता है।
यह यात्रा बताती है कि जब रचनात्मकता को साहस और सामाजिक सोच का साथ मिले, तो शौक़ इतिहास रच देता हैऔर स्थानीय हुनर, वैश्विक मंच पर चमक उठता है।
सपने से सेवा तक: ‘बसंत आई क्लिनिक’ ने बदली दृष्टि, बदला जीवन
शिमला।
कुछ सपने निजी होते हैं, लेकिन जब उन्हें सही समर्थन और संकल्प मिल जाए, तो वे समाज की अमूल्य धरोहर बन जाते हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है डॉ. गुंजन जोशी की, जिन्होंने अपने सपने को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि समुदाय-सेवा का मिशन बनाया। बसंत आई क्लिनिक’ की स्थापना किसी व्यावसायिक योजना से नहीं, बल्कि भावनाओं से हुई। यह क्लिनिक संस्थापक के दिवंगत पिता की स्मृति में एक हृदयस्पर्शी श्रद्धांजलि है, जहां समर्पण और चिकित्सकीय विशेषज्ञता साथ मिलती हैं। लक्ष्य साफ़ था: ऐसी सुविधा खड़ी करना, जहां गुणवत्तापूर्ण नेत्र-चिकित्सा हर ज़रूरतमंद तक पहुंचे।
भावनात्मक संकल्प को ज़मीन पर उतारने के लिए संसाधनों की ज़रूरत थी। यहीं निर्णायक भूमिका निभाई मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना (MMSY) ने। इस सरकारी समर्थन से आवश्यक वित्तीय प्रोत्साहन और तकनीकी सुदृढ़ीकरण संभव हुआ और क्लिनिक आधुनिक उपकरणों के साथ विशेषज्ञ नेत्र-सेवा देने के लिए तैयार हो सका।
परिणाम असाधारण रहे। सिर्फ़ तीन वर्षों में ‘बसंत आई क्लिनिक’ जिले के शीर्ष विशेष नेत्र केंद्रों में शुमार हो गया। सटीक निदान, उन्नत तकनीक और मानवीय संवेदना, इन तीनों के संतुलन ने क्लिनिक को भरोसे का नाम बना दिया। डॉ. गुंजन जोशी कहती हैं, “मैं उस अवसर के लिए आभारी हूं, जिसने एक सपने को टिकाऊ दृष्टि में बदल दिया। आज यह क्लिनिक सिर्फ़ इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि उम्मीद और भरोसे का प्रतीक है—जहां हर मरीज़ को सम्मान, हर दृष्टि को रोशनी मिलती है।
बसंत आई क्लिनिक’ की यात्रा बताती है कि जब व्यक्तिगत संकल्प, सरकारी सहयोग और पेशेवर प्रतिबद्धता साथ आते हैं, तो स्वास्थ्य सेवाएं भी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन जाती हैं। यह कहानी सिर्फ़ एक क्लिनिक की नहीं—सपनों के सार्वजनिक संपत्ति बनने की कहानी है।
सपने से स्टार्टअप तक: ‘देवतरु’ ने दिखाया हिम्मत हो तो असंभव कुछ भी नहीं
शिमला।
कई लोग सपने देखते हैं, लेकिन कुछ ही उन्हें सच करने की हिम्मत जुटाते हैं। यह कहानी है योगितराज शर्मा की, जिन्होंने यह ठान लिया था कि कभी कोशिश ही न करने का पछतावा लेकर बूढ़ा नहीं होना है।
बीस की उम्र से काम उनके जीवन का हिस्सा रहा। एक स्थिर करियर और ट्रैवल बिज़नेस में पहले झटके के बावजूद उद्यमिता का सपना बुझा नहीं। ‘देवतरु’ का विचार उन्हें एकदम स्पष्ट रूप में, एक सपने में दिखा। यहीं से शुरुआत हुई उस यात्रा की, जिसने घरेलू नुस्खे को एक राष्ट्रीय ब्रांड में बदल दिया।
योगितराज ने अपनी बहन के घर में बनने वाले पारंपरिक हेयर ऑयल को व्यावसायिक रूप देने का निर्णय लिया। खुद का लोगो डिज़ाइन किया, परिवार के सहारे ब्रांड लॉन्च किया और एक स्पष्ट दर्शन अपनाया—100% प्राकृतिक। यह सिर्फ़ उत्पाद नहीं, भरोसे का वादा था।
28 अक्टूबर 2025 को ‘देवतरु’ हेयर ऑयल आधिकारिक तौर पर लॉन्च हुआ। शुरुआती शिपमेंट्स में दिल्ली और शिमला भेजी गई खेप में बोतलें टूट गईं, जो नए उद्यमी के लिए दिल तोड़ने वाला पल। लेकिन यहीं से सीख मिली। पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स सुधारे गए और खेल पलट गया।
सुधार के बाद नतीजे चौंकाने वाले रहे। सिर्फ़ दो महीनों में स्टॉक रिलीज़ होते ही सोल्ड आउट। मांग बढ़ी और शिपमेंट्स पुणे, राजस्थान और गुरुग्राम तक पहुंचने लगे। बढ़ती डिमांड संभालने में उनके पति कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े हैं, यह साझेदारी ‘देवतरु’ की ताक़त बन गई।
योगितराज कहती हैं, अगर आपके पास इच्छाशक्ति और जुनून है, तो कुछ भी असंभव नहीं। आज ‘देवतरु’ सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं, बल्कि हिम्मत, सीख और निरंतर सुधार की मिसाल है—जो बताती है कि असफलता अंत नहीं, सही दिशा में अगला कदम होती है। ‘देवतरु’ की कहानी हर उस सपने देखने वाले के लिए प्रेरणा है, जो शुरुआत से डरता है। यह याद दिलाती है—कोशिश की जाए तो रास्ते खुद बनते हैं, और पछतावे की जगह उपलब्धि ले लेती है।
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लाहौल की ऊन से औषधियों तक: ‘लाहौल बास्केट’ ने रचा आत्मनिर्भर हिमालय की कहानी
शिमला।
बर्फ़ीली वादियों में जहां जीवन संघर्ष से आकार लेता है, वहीं अनुशासन और सामूहिक मेहनत नई राहें खोलती हैं। ऐसी ही एक मिसाल है लाहौल बास्केट, एक ऐसा ब्रांड, जिसने पारंपरिक ऊन को आधुनिक बाज़ार से और हिमालयी जड़ी-बूटियों को स्वास्थ्य से जोड़ दिया। इस प्रेरक यात्रा की अगुवाई कर रही हैं अनीता नालवा।
साल 2003 में लाहौल बास्केट की नींव एक सेल्फ हेल्प ग्रुप के रूप में पड़ी। फोकस था क्षेत्र की पहचान लाहौली ऊनी मोज़े। आजीविका के छोटे प्रयास ने वित्तीय अनुशासन की बदौलत मज़बूत आधार बनाया। समूह ने यूको बैंक से ₹1.82 लाख का ऋण लेकर न केवल सुरक्षित किया, बल्कि समय पर चुका भी दिया, यही भरोसा आगे की उड़ान बना।
2019 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से जुड़ाव ने राह खोल दी। प्रीमियम प्रदर्शनियों और स्टॉल्स में भागीदारी मिली, पारंपरिक उत्पादों को दृश्यता मिली और बिक्री में तेज़ी आई। पहाड़ों की मेहनत अब देशभर के ग्राहकों तक पहुंचने लगी।
उद्यमी सोच का असली इम्तिहान तब हुआ जब अनीता नालवा ने हैंडलूम से आगे बढ़ने का फैसला किया। 2021 में NIFT कांगड़ा के साथ ‘Secure Himalaya’ प्रोजेक्ट के तहत पांगी क्षेत्र में 45 दिन का गहन कार्य और फिर हिमालयी वनस्पतियों की क्षमता को पहचानते हुए औषधीय पौधों में विशेषज्ञ प्रशिक्षण। RSETI धर्मशाला और RCFC जोगिंदर नगर से मिली सीख ने लाहौल बास्केट को ड्युअल-स्पेशियलिटी ब्रांड में बदल दिया।
आज लाहौल बास्केट पारंपरिक ऊनी उत्पादों के साथ-साथ मूल्यवर्धित हर्बल उत्पाद भी पेश करता है और इन्हें ORGANIC/Organise जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सफलतापूर्वक बाज़ार में उतारा जा रहा है। अनीता नालवा कहती हैं, “मोज़े बुनने से लेकर हिमालयी जड़ी-बूटियों के प्रसंस्करण तक हमारी यात्रा लाहौल की आत्मा को सहेजने की है।
2003 से निरंतर संचालन, NIFT व RCFC जैसे संस्थानों की साझेदारी और लाहौली ऊन व हर्बल उत्पादों की विशिष्ट रेंज—लाहौल बास्केट आज आत्मनिर्भर हिमालय का प्रतीक है। यह कहानी बताती है कि जब स्थानीय पहचान, सही प्रशिक्षण और बाज़ार की समझ एक साथ आती है, तो पहाड़ों से भी टिकाऊ विकास की मिसाल खड़ी हो जाती है।
