हिमाचल प्रदेश में कम होती बारिश और बर्फबारी अब केवल मौसम की अनियमितता नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गहरी और स्थायी होती समस्या का संकेत बन चुकी है। झरनों का सूखना, नदियों में घटता जलस्तर और पेयजल संकट इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि पहाड़ी राज्य जलवायु परिवर्तन की मार सबसे पहले झेल रहा है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर पड़ने से बर्फबारी में भारी गिरावट दर्ज की गई है। बढ़ते तापमान के कारण जो बर्फ गिर भी रही है, वह लंबे समय तक टिक नहीं पा रही। इससे प्राकृतिक जल भंडारण व्यवस्था प्रभावित हो रही है और “स्नो ड्राउट” जैसे नए खतरे सामने आ रहे हैं। इसका सीधा असर खेती, बागवानी और ग्रामीण आजीविका पर पड़ रहा है। हालांकि, इस संकट के लिए केवल जलवायु परिवर्तन को दोषी ठहराना भी पर्याप्त नहीं होगा। अनियंत्रित निर्माण, वनों की कटाई और कमजोर जल प्रबंधन ने समस्या को और गंभीर बनाया है। विकास के नाम पर प्रकृति के साथ लगातार हो रहे समझौते अब भारी पड़ने लगे हैं। अब समय आ गया है कि चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाए। जल संरक्षण, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, स्मार्ट कृषि और पर्यावरण-संतुलित विकास नीति अपनाए बिना समाधान संभव नहीं है। हिमाचल का सूखा सिर्फ एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय की राष्ट्रीय चुनौती का संकेत है—जिससे निपटने के लिए आज ही ठोस और सामूहिक कदम उठाने होंगे। हिमाचल प्रदेश में लगातार कम बारिश और बर्फबारी के कारण कई इलाकों में सूखे जैसे हालात बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन, कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और मानव गतिविधियाँ इसकी बड़ी वजह हैं। हालांकि, समय रहते सही कदम उठाकर इस संकट से निपटा जा सकता है। जल संरक्षण सबसे अहम वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों (नौले, धाराएं, कुहल) का संरक्षण और भूजल रिचार्ज से पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। स्मार्ट खेती की जरूरत कम पानी वाली फसलें, ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकें किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती हैं। जंगल और समुदाय की भूमिका वन संरक्षण और स्थानीय प्रजातियों का वृक्षारोपण जल संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। वहीं, गांव स्तर पर जल समितियां बनाकर पानी का न्यायपूर्ण उपयोग जरूरी है। हिमाचल प्रदेश में उभरता सूखा अब केवल मौसम की अनिश्चितताओं का परिणाम नहीं रहा, बल्कि यह स्पष्ट रूप से कमजोर प्रबंधन और अदूरदर्शी विकास नीतियों की भी परीक्षा ले रहा है। बदलते जलवायु पैटर्न ने संकट की गंभीरता जरूर बढ़ाई है, लेकिन जल संरक्षण की उपेक्षा, पारंपरिक जल स्रोतों की अनदेखी और योजनाओं के आधे-अधूरे क्रियान्वयन ने हालात को और बिगाड़ा है। इस चुनौती से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर ठोस प्रयासों की सबसे अधिक आवश्यकता है। वर्षा जल संचयन, झरनों और धाराओं का संरक्षण, तथा सामुदायिक भागीदारी के बिना कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती। इसके साथ ही आधुनिक तकनीकों—जैसे माइक्रो सिंचाई, जलवायु-अनुकूल खेती और वैज्ञानिक जल प्रबंधन—को जमीन पर उतारना अनिवार्य है। सरकारी योजनाएं तभी प्रभावी साबित होंगी, जब उनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता, निरंतर निगरानी और स्थानीय जरूरतों की समझ शामिल होगी। सूखा हिमाचल के लिए केवल एक मौसमी चेतावनी नहीं, बल्कि भविष्य के लिए गंभीर संकेत है। यदि आज संतुलित विकास और जल संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराता जाएगा। इसलिए अब वक्त बहस का नहीं, बल्कि निर्णायक और सामूहिक कार्रवाई का है।
लेखक:
राजन कुमार शर्मा,
प्रशिक्षण प्रभारी एवं आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ
जिला ऊना, हिमाचल प्रदेश
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